श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 22: श्रीराम का लक्ष्मण को समझाते हुए अपने वनवास में दैव को ही कारण बताना और अभिषेक की सामग्री को हटा लेने का आदेश देना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  2.22.15 
कृतान्त एव सौमित्रे द्रष्टव्यो मत्प्रवासने।
राज्यस्य च वितीर्णस्य पुनरेव निवर्तने॥ १५॥
 
 
अनुवाद
हे सुमित्रपुत्र! मेरे भ्रमण का कारण तथा पिता द्वारा दिया गया राज्य मेरे हाथ से निकल जाना, यही भाग्य समझना चाहिए ॥15॥
 
'O son of Sumitra, the reason for my travels and the kingdom given to me by my father slipping away from my hands should be considered to be destiny. ॥ 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)