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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
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काण्ड 2: अयोध्या काण्ड
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सर्ग 22: श्रीराम का लक्ष्मण को समझाते हुए अपने वनवास में दैव को ही कारण बताना और अभिषेक की सामग्री को हटा लेने का आदेश देना
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श्लोक 13
श्लोक
2.22.13
मयि चीराजिनधरे जटामण्डलधारिणि।
गतेऽरण्यं च कैकेय्या भविष्यति मन: सुखम्॥ १३॥
अनुवाद
'जब मैं छाल और मृगचर्म धारण करके वन में जाऊँगा और सिर पर जटाएँ बाँधूँगा, तभी कैकेयी का मन प्रसन्न होगा।॥13॥
'When I go to the forest wearing bark and deerskin, and tie matted locks on my head, only then will Kaikeyi's mind attain happiness.॥ 13॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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