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ramayan 2.21.55: धर्म में स्थित होकर उन्होंने अपनी मूर्च्छित हो रही माता से तथा व्याकुल एवं दुखी हुए सुमित्रापुत्र लक्ष्मण से धर्मानुसार वही कहा जो उस अवसर पर वे ही कह सकते थे ॥ 55॥   |   ramayan सर्ग 2.21: लक्ष्मण का श्रीराम को बलपूर्वक राज्य पर अधिकार कर लेने के लिये प्रेरित करना तथा श्रीराम का पिता की आज्ञा के पालन को ही धर्म बताना   ।   ramayan काण्ड 2: अयोध्या काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 21: लक्ष्मण का श्रीराम को बलपूर्वक राज्य पर अधिकार कर लेने के लिये प्रेरित करना तथा श्रीराम का पिता की आज्ञा के पालन को ही धर्म बताना  »  श्लोक 55
 
 
श्लोक  2.21.55 
स मातरं चैव विसंज्ञकल्पा-
मार्तं च सौमित्रिमभिप्रतप्तम्।
धर्मे स्थितो धर्म्यमुवाच वाक्यं
यथा स एवार्हति तत्र वक्तुम्॥ ५५॥
 
 
अनुवाद
धर्म में स्थित होकर उन्होंने अपनी मूर्च्छित हो रही माता से तथा व्याकुल एवं दुखी हुए सुमित्रापुत्र लक्ष्मण से धर्मानुसार वही कहा जो उस अवसर पर वे ही कह सकते थे ॥ 55॥
 
Remaining firmly established in Dharma, He spoke to his mother who was becoming unconscious and to Sumitra's son Lakshmana who was distressed and distressed, in accordance with Dharma, what only He could have said on that occasion. ॥ 55॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)