श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 19: श्रीराम का वन में जाना स्वीकार करके उनका माता कौसल्या के पास आज्ञा लेने के लिये जाना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  2.19.4 
मन्युर्न च त्वया कार्यो देवि ब्रूमि तवाग्रत:।
यास्यामि भव सुप्रीता वनं चीरजटाधर:॥ ४॥
 
 
अनुवाद
'देवी! मैं आपके सामने ऐसी बात पूछ रहा हूँ, इसलिए आपको क्रोधित नहीं होना चाहिए। मैं वस्त्र और जटा धारण करके वन में अवश्य जाऊँगा, आप प्रसन्न रहें।'
 
‘Devi! I am asking you such a thing in front of you, so you should not get angry. I will definitely go to the forest wearing a cloth and matted hair, you stay happy.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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