श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 19: श्रीराम का वन में जाना स्वीकार करके उनका माता कौसल्या के पास आज्ञा लेने के लिये जाना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  2.19.15 
व्रीडान्वित: स्वयं यच्च नृपस्त्वां नाभिभाषते।
नैतत् किंचिन्नरश्रेष्ठ मन्युरेषोऽपनीयताम्॥ १५॥
 
 
अनुवाद
हे पुरुषोत्तम! यदि राजा स्वयं लज्जित होकर तुमसे न कहे, तो यह विचारणीय बात नहीं है। अतः इस शोक को अपने मन से निकाल दो॥15॥
 
‘Best of men! If the king himself does not tell you because he is ashamed, then this is not a matter to be considered. Therefore, remove this sorrow from your mind.॥ 15॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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