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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 12: महाराज दशरथ की चिन्ता, विलाप, कैकेयी को फटकारना, समझाना और उससे वैसा वर न माँगने के लिये अनुरोध करना  »  श्लोक 96-97
 
 
श्लोक  2.12.96-97 
यस्य चाहारसमये सूदा: कुण्डलधारिण:।
अहंपूर्वा: पचन्ति स्म प्रसन्ना: पानभोजनम्॥ ९६॥
स कथं नु कषायाणि तिक्तानि कटुकानि च।
भक्षयन् वन्यमाहारं सुतो मे वर्तयिष्यति॥ ९७॥
 
 
अनुवाद
'जिसके लिए बालियों वाले रसोइये भोजन के समय 'मैं पहले पकाऊँगा' कहकर प्रसन्नतापूर्वक भोजन तैयार करते थे, वह मेरा पुत्र रामचन्द्र वन में कषाय, कटु और तीखे फल खाकर कैसे जीवित रहेगा?॥ 96-97॥
 
'How will my son Ramachandra, for whom the cooks with earrings happily prepared food saying, 'I will cook first' at mealtime, survive in the forest eating astringent, bitter and pungent fruits?॥ 96-97॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)