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ramayan 2.12.86: यदि मेरे वन जाने की आज्ञा देने पर भी भगवान् रामजी इसके विपरीत करते और वहाँ न जाते, तो वह मेरे लिए बड़ी प्रसन्नता की बात होती; परन्तु मेरा पुत्र ऐसा नहीं कर सकता॥ 86॥   |   ramayan सर्ग 2.12: महाराज दशरथ की चिन्ता, विलाप, कैकेयी को फटकारना, समझाना और उससे वैसा वर न माँगने के लिये अनुरोध करना   ।   ramayan काण्ड 2: अयोध्या काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 12: महाराज दशरथ की चिन्ता, विलाप, कैकेयी को फटकारना, समझाना और उससे वैसा वर न माँगने के लिये अनुरोध करना  »  श्लोक 86
 
 
श्लोक  2.12.86 
यदि मे राघव: कुर्याद् वनं गच्छेति चोदित:।
प्रतिकूलं प्रियं मे स्यान्न तु वत्स: करिष्यति॥ ८६॥
 
 
अनुवाद
यदि मेरे वन जाने की आज्ञा देने पर भी भगवान् रामजी इसके विपरीत करते और वहाँ न जाते, तो वह मेरे लिए बड़ी प्रसन्नता की बात होती; परन्तु मेरा पुत्र ऐसा नहीं कर सकता॥ 86॥
 
‘If, despite my permission to go to the forest, Lord Rama had done the opposite and had not gone there, that would have been a pleasant thing for me; but my son cannot do that.॥ 86॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)