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ramayan 2.12.111: ‘देवि! मैं अपने पुत्र श्री राम के बिना नहीं रह सकता, फिर मुझे सुख कैसे मिलेगा? आत्मज्ञानी पुरुष भी अपने पुत्रों के वियोग में शांति नहीं पाते? अतः आप मेरा अनिष्ट न करें। मैं आपके चरणों का स्पर्श करता हूँ, आप मुझ पर प्रसन्न हों।’॥111॥   |   ramayan सर्ग 2.12: महाराज दशरथ की चिन्ता, विलाप, कैकेयी को फटकारना, समझाना और उससे वैसा वर न माँगने के लिये अनुरोध करना   ।   ramayan काण्ड 2: अयोध्या काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 12: महाराज दशरथ की चिन्ता, विलाप, कैकेयी को फटकारना, समझाना और उससे वैसा वर न माँगने के लिये अनुरोध करना  »  श्लोक 111
 
 
श्लोक  2.12.111 
न जीवितं मेऽस्ति कुत: पुन: सुखं
विनात्मजेनात्मवतां कुतो रति:।
ममाहितं देवि न कर्तुमर्हसि
स्पृशामि पादावपि ते प्रसीद मे॥ १११॥
 
 
अनुवाद
‘देवि! मैं अपने पुत्र श्री राम के बिना नहीं रह सकता, फिर मुझे सुख कैसे मिलेगा? आत्मज्ञानी पुरुष भी अपने पुत्रों के वियोग में शांति नहीं पाते? अतः आप मेरा अनिष्ट न करें। मैं आपके चरणों का स्पर्श करता हूँ, आप मुझ पर प्रसन्न हों।’॥111॥
 
‘Devi! I cannot live without my son Shri Ram, then how can I have happiness? Even self-realized men cannot find peace after being separated from their sons? Therefore, do not harm me. I touch your feet, please be pleased with me.’॥111॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)