श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 119: अनसूया की आज्ञा से सीता का उनके दिये हुए वस्त्राभूषणों को धारण करके श्रीरामजी के पास आना  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  2.119.8 
रजनीचरसत्त्वानि प्रचरन्ति समन्तत:।
तपोवनमृगा ह्येते वेदितीर्थेषु शेरते॥ ८॥
 
 
अनुवाद
रात्रि में विचरण करने वाले प्राणी (उल्लू आदि) सब दिशाओं में विचरण कर रहे हैं और आश्रम के मृग उस पवित्र स्थान के विभिन्न भागों में, जैसे वेदी आदि में सो रहे हैं॥8॥
 
‘The creatures that roam about at night (owls etc.) are roaming about in all directions, and the deer of the hermitage are sleeping in various parts of the ashram, which is a holy place, such as the altar etc.॥ 8॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)