श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 119: अनसूया की आज्ञा से सीता का उनके दिये हुए वस्त्राभूषणों को धारण करके श्रीरामजी के पास आना  »  श्लोक 3-4
 
 
श्लोक  2.119.3-4 
रमेयं कथया ते तु दृढं मधुरभाषिणि।
रविरस्तं गत: श्रीमानुपोह्य रजनीं शुभाम्॥ ३॥
दिवसं परिकीर्णानामाहारार्थं पतत्त्रिणाम्।
संध्याकाले निलीनानां निद्रार्थं श्रूयते ध्वनि:॥ ४॥
 
 
अनुवाद
'मधुरभाषी सीता! मुझे तुम्हारी कथा बहुत अच्छी लग रही है; किन्तु अब सूर्यदेव रात्रि का शुभ समय निकट लाकर अस्त हो गए हैं। जो पक्षी दिन में इधर-उधर दाना चुगने के लिए इधर-उधर भटकते थे, वे अब आकर अपने घोंसलों में छिपकर सो गए हैं; यह उनकी ध्वनि है जो सुनाई दे रही है।'
 
'Sweet-spoken Sita! I am very much enjoying your story; however, the radiant Sun has set after bringing the auspicious time of the night near. The birds that were scattered around to eat food during the day have now come and hidden themselves in their nests to sleep in the evening; this is their sound that can be heard.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)