श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 119: अनसूया की आज्ञा से सीता का उनके दिये हुए वस्त्राभूषणों को धारण करके श्रीरामजी के पास आना  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  2.119.20 
उच्छिष्टं वा प्रमत्तं वा तापसं ब्रह्मचारिणम्।
अदन्त्यस्मिन् महारण्ये तान् निवारय राघव॥ २०॥
 
 
अनुवाद
'राघवेन्द्र! यदि कोई तपस्वी या ब्रह्मचारी यहाँ अशुद्ध या प्रमादग्रस्त अवस्था में पाया जाता है, तो उसे इस महान् वन में वे राक्षस और हिंसक पशु खा जाते हैं; अतः तुम उन्हें रोककर यहाँ से भगा दो॥ 20॥
 
'Raghavendra! If any ascetic or brahmacari is found here in an impure or careless state, he is eaten by those demons and ferocious animals in this great forest; therefore, you must stop them and drive them away from here.॥ 20॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)