श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 119: अनसूया की आज्ञा से सीता का उनके दिये हुए वस्त्राभूषणों को धारण करके श्रीरामजी के पास आना  »  श्लोक 18-19
 
 
श्लोक  2.119.18-19 
तावूचुस्ते वनचरास्तापसा धर्मचारिण:।
वनस्य तस्य संचारं राक्षसै: समभिप्लुतम्॥ १८॥
रक्षांसि पुरुषादानि नानारूपाणि राघव।
वसन्त्यस्मिन् महारण्ये व्यालाश्च रुधिराशना:॥ १९॥
 
 
अनुवाद
तब उस धर्मनिष्ठ वनवासी तपस्वी ने उन दोनों भाइयों से इस प्रकार कहा - 'रघुनन्दन! इस वन का मार्ग राक्षसों से भरा हुआ है - वे यहाँ उत्पात मचाते रहते हैं। इस विशाल वन में नाना प्रकार के नरभक्षी राक्षस और रक्तभक्षी हिंसक पशु निवास करते हैं ॥18-19॥
 
Then that devout forest-dwelling ascetic spoke to those two brothers like this - 'Raghunandan! The road to this forest is infested with demons – they keep on creating havoc here. In this vast forest, man-eating demons and blood-eating violent animals of various forms reside. 18-19॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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