vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Apps
About
Contact
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
»
काण्ड 2: अयोध्या काण्ड
»
सर्ग 118: सीता-अनसूया-संवाद, अनसूया का सीता को प्रेमोपहार देना तथा अनसूया के पूछने पर सीता का उन्हें अपने स्वयंवर की कथा सुनाना
»
श्लोक 50
श्लोक
2.118.50
ततोऽहं तत्र रामाय पित्रा सत्याभिसंधिना।
उद्यता दातुमुद्यम्य जलभाजनमुत्तमम्॥ ५०॥
अनुवाद
'तब मेरे पिता ने अपने वचन के अनुसार जल से भरा एक बड़ा पात्र लिया और मुझे श्री राम को सौंपने का प्रयत्न किया।
'Then my father, true to his word, took a large vessel full of water and made efforts to hand me over to Sri Rama.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
About Us
|
Contact Us
|
Privacy Policy
|
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×