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ramayan 2.118.36: राजा यह देखकर कि वह अपमान सहने का क्षण बहुत निकट आ गया है, चिंता के सागर में डूब गए। जिस प्रकार नाव के बिना मनुष्य दूसरे किनारे तक नहीं पहुँच सकता, उसी प्रकार मेरे पिता भी अपनी चिंताओं पर विजय पाने में असमर्थ थे।   |   ramayan सर्ग 2.118: सीता-अनसूया-संवाद, अनसूया का सीता को प्रेमोपहार देना तथा अनसूया के पूछने पर सीता का उन्हें अपने स्वयंवर की कथा सुनाना   ।   ramayan काण्ड 2: अयोध्या काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 118: सीता-अनसूया-संवाद, अनसूया का सीता को प्रेमोपहार देना तथा अनसूया के पूछने पर सीता का उन्हें अपने स्वयंवर की कथा सुनाना  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  2.118.36 
तां धर्षणामदूरस्थां संदृश्यात्मनि पार्थिव:।
चिन्तार्णवगत: पारं नाससादाप्लवो यथा॥ ३६॥
 
 
अनुवाद
राजा यह देखकर कि वह अपमान सहने का क्षण बहुत निकट आ गया है, चिंता के सागर में डूब गए। जिस प्रकार नाव के बिना मनुष्य दूसरे किनारे तक नहीं पहुँच सकता, उसी प्रकार मेरे पिता भी अपनी चिंताओं पर विजय पाने में असमर्थ थे।
 
'The king, seeing that the moment when he would have to endure that insult had come very near, was drowned in the sea of ​​worry. Just as a man without a boat cannot reach the other shore, in the same way my father was also unable to overcome his worries.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)