श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 118: सीता-अनसूया-संवाद, अनसूया का सीता को प्रेमोपहार देना तथा अनसूया के पूछने पर सीता का उन्हें अपने स्वयंवर की कथा सुनाना  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  2.118.32 
तत: प्रहृष्टो धर्मात्मा पिता मे मिथिलाधिप:।
अवाप्तो विपुलामृद्धिं मामवाप्य नराधिप:॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
'यह दिव्य वाणी सुनकर मेरे धर्मात्मा पिता मिथिला के राजा बहुत प्रसन्न हुए। मुझे पाकर मानो राजा को महान् ऐश्वर्य प्राप्त हो गया हो॥ 32॥
 
'My pious father, the King of Mithila, was very pleased to hear this heavenly voice. It was as if the King had attained great prosperity by getting me.॥ 32॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)