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अनपत्येन च स्नेहादङ्कमारोप्य च स्वयम्।
ममेयं तनयेत्युक्त्वा स्नेहो मयि निपातित:॥३०॥
अनुवाद
उन दिनों उनके कोई और संतान नहीं थी, इसलिए स्नेहवश उन्होंने स्वयं मुझे गोद में ले लिया और अपने हृदय का सारा स्नेह मुझ पर उड़ेलते हुए कहा, 'यह मेरी पुत्री है।'
In those days he had no other child, so out of affection he himself took me in his lap and showered all the affection of his heart upon me, saying, 'This is my daughter.'
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥