श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 118: सीता-अनसूया-संवाद, अनसूया का सीता को प्रेमोपहार देना तथा अनसूया के पूछने पर सीता का उन्हें अपने स्वयंवर की कथा सुनाना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  2.118.3 
यद्यप्येष भवेद् भर्ता अनार्यो वृत्तिवर्जित:।
अद्वैधमत्र वर्तव्यं यथाप्येष मया भवेत्॥ ३॥
 
 
अनुवाद
'यदि मेरा पति असभ्य स्वभाव का होता, निर्धन होता, जीविका का कोई साधन न होता, तो भी मैं बिना किसी हिचकिचाहट के उसकी सेवा करती रहती॥3॥
 
'Even if my husband had been of uncivilised character and had been poor and devoid of any means of livelihood, I would still have continued serving him without any hesitation.॥ 3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)