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ramayan 2.118.28: एक समय वे हाथ में हल लेकर यज्ञ के लिए उपयुक्त भूमि जोत रहे थे, उसी समय पृथ्वी को चीरकर मैं प्रकट हुई। ऐसा करने से ही मैं राजा जनक की पुत्री हुई।   |   ramayan सर्ग 2.118: सीता-अनसूया-संवाद, अनसूया का सीता को प्रेमोपहार देना तथा अनसूया के पूछने पर सीता का उन्हें अपने स्वयंवर की कथा सुनाना   ।   ramayan काण्ड 2: अयोध्या काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 118: सीता-अनसूया-संवाद, अनसूया का सीता को प्रेमोपहार देना तथा अनसूया के पूछने पर सीता का उन्हें अपने स्वयंवर की कथा सुनाना  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  2.118.28 
तस्य लाङ्गलहस्तस्य कृषत: क्षेत्रमण्डलम्।
अहं किलोत्थिता भित्त्वा जगतीं नृपते: सुता॥ २८॥
 
 
अनुवाद
एक समय वे हाथ में हल लेकर यज्ञ के लिए उपयुक्त भूमि जोत रहे थे, उसी समय पृथ्वी को चीरकर मैं प्रकट हुई। ऐसा करने से ही मैं राजा जनक की पुत्री हुई।
 
‘Once upon a time, he was ploughing the field suitable for the yagya with a plough in his hand; at that very time I appeared by splitting the earth. Just by doing this I became the daughter of King Janaka.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)