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ramayan 2.117.5: वहाँ से अत्रि के आश्रम में पहुँचकर महाप्रतापी श्री राम ने उन्हें प्रणाम किया और भगवान अत्रि ने भी प्रेमपूर्वक उन्हें अपने पुत्र के समान अपना लिया॥5॥   |   ramayan सर्ग 2.117: श्रीराम आदि का अत्रिमुनि के आश्रम पर जाकर उनके द्वारा सत्कृत होना तथा अनसूया द्वारा सीता का सत्कार   ।   ramayan काण्ड 2: अयोध्या काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 117: श्रीराम आदि का अत्रिमुनि के आश्रम पर जाकर उनके द्वारा सत्कृत होना तथा अनसूया द्वारा सीता का सत्कार  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  2.117.5 
सोऽत्रेराश्रममासाद्य तं ववन्दे महायशा:।
तं चापि भगवानत्रि: पुत्रवत् प्रत्यपद्यत॥ ५॥
 
 
अनुवाद
वहाँ से अत्रि के आश्रम में पहुँचकर महाप्रतापी श्री राम ने उन्हें प्रणाम किया और भगवान अत्रि ने भी प्रेमपूर्वक उन्हें अपने पुत्र के समान अपना लिया॥5॥
 
From there, after reaching Atri's ashram, the illustrious Shri Ram bowed to him and Lord Atri also lovingly adopted him like his own son. 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)