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ramayan 2.116.9: ‘तत्! जो स्वभाव से ही दयालु हैं और सदैव सबके कल्याण में तत्पर रहती हैं, वे विदेहनन्दिनी सीता, विशेषकर तपस्वियों के प्रति अपने दयालु स्वभाव से विचलित कैसे हो सकती हैं?’   |   ramayan सर्ग 2.116: वृद्ध कुलपति सहित बहुत-से ऋषियों का चित्रकूट छोड़कर दूसरे आश्रम में जाना   ।   ramayan काण्ड 2: अयोध्या काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 116: वृद्ध कुलपति सहित बहुत-से ऋषियों का चित्रकूट छोड़कर दूसरे आश्रम में जाना  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  2.116.9 
कुत: कल्याणसत्त्वाया: कल्याणाभिरते: सदा।
चलनं तात वैदेह्यास्तपस्विषु विशेषत:॥ ९॥
 
 
अनुवाद
‘तत्! जो स्वभाव से ही दयालु हैं और सदैव सबके कल्याण में तत्पर रहती हैं, वे विदेहनन्दिनी सीता, विशेषकर तपस्वियों के प्रति अपने दयालु स्वभाव से विचलित कैसे हो सकती हैं?’
 
‘Tat! How is it possible for Videhanandini Sita, who is benevolent by nature and is always engaged in the welfare of all, to deviate from her benevolent nature especially while behaving towards the ascetics? 9॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)