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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 116: वृद्ध कुलपति सहित बहुत-से ऋषियों का चित्रकूट छोड़कर दूसरे आश्रम में जाना  »  श्लोक 11-12
 
 
श्लोक  2.116.11-12 
रावणावरज: कश्चित् खरो नामेह राक्षस:।
उत्पाटॺ तापसान् सर्वाञ्जनस्थाननिवासिन:॥ ११॥
धृष्टश्च जितकाशी च नृशंस: पुरुषादक:।
अवलिप्तश्च पापश्च त्वां च तात न मृष्यते॥ १२॥
 
 
अनुवाद
'पिताजी! यहाँ वन प्रदेश में रावण का छोटा भाई खर नामक एक राक्षस रहता है, जिसने जनस्थान में रहने वाले समस्त तपस्वियों को नष्ट कर दिया है। वह बड़ा ही दुस्साहसी, विजयोन्मादी, क्रूर, नरभक्षी और अभिमानी है। वह आपको भी सहन नहीं कर सकता।॥ 11-12॥
 
‘Father! Here in the forest region there is a demon named Khar, the younger brother of Ravana, who has uprooted all the ascetics living in Janasthan. He is very impudent, victory-crazy, cruel, cannibalistic and arrogant. He cannot tolerate even you.॥ 11-12॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)