श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 115: भरत का नन्दिग्राम में जाकर श्रीराम की चरणपादुकाओं को राज्य पर अभिषिक्त करके उन्हें निवेदन पूर्वक राज्य का सब कार्य करना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  2.115.5 
सुभृशं श्लाघनीयं च यदुक्तं भरत त्वया।
वचनं भ्रातृवात्सल्यादनुरूपं तवैव तत्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
‘भारत! तुमने भ्रातृभक्ति से प्रेरित होकर जो कहा है, वह अत्यन्त प्रशंसनीय है। वास्तव में वह तुम्हारे योग्य है। ॥5॥
 
‘Bharat! What you have said, inspired by brotherly devotion, is very praiseworthy. In fact, it is worthy of you. ॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)