श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 115: भरत का नन्दिग्राम में जाकर श्रीराम की चरणपादुकाओं को राज्य पर अभिषिक्त करके उन्हें निवेदन पूर्वक राज्य का सब कार्य करना  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  2.115.27 
तदा हि यत् कार्यमुपैति किंचि-
दुपायनं चोपहृतं महार्हम्।
स पादुकाभ्यां प्रथमं निवेद्य
चकार पश्चाद् भरतो यथावत्॥ २७॥
 
 
अनुवाद
उस समय जो भी कार्य करना होता था, जो भी बहुमूल्य भेंट आती थी, वह सबसे पहले उन चरणपादुकाओं को अर्पित की जाती थी और फिर भरतजी उसकी उचित व्यवस्था करते थे।
 
At that time whatever work was to be done, whatever precious gift came, first of all it was offered to those sandals and then Bharataji would make proper arrangements for it. 27.
 
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे पञ्चदशाधिकशततम: सर्ग:॥ ११५॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एक सौ पंद्रहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ११५॥
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)