श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 115: भरत का नन्दिग्राम में जाकर श्रीराम की चरणपादुकाओं को राज्य पर अभिषिक्त करके उन्हें निवेदन पूर्वक राज्य का सब कार्य करना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  2.115.17 
भ्रात्रा तु मयि संन्यासो निक्षिप्त: सौहृदादयम्।
तमिमं पालयिष्यामि राघवागमनं प्रति॥ १७॥
 
 
अनुवाद
'मेरे भाई ने प्रेमवश यह खजाना मुझे सौंपा है, इसलिए जब तक वह लौटकर न आए, मैं इसकी अच्छी तरह रक्षा करूँगा ॥ 17॥
 
'My brother has entrusted this treasure to me out of love, so I will safeguard it well until he returns.॥ 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)