श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 115: भरत का नन्दिग्राम में जाकर श्रीराम की चरणपादुकाओं को राज्य पर अभिषिक्त करके उन्हें निवेदन पूर्वक राज्य का सब कार्य करना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  2.115.15 
भरत: शिरसा कृत्वा संन्यासं पादुके तत:।
अब्रवीद् दु:खसंतप्त: सर्वं प्रकृतिमण्डलम्॥ १५॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् भरत ने सिर झुकाकर सम्पूर्ण प्रकृति लोक (मंत्री, सेनापति और प्रजा आदि) से कहा कि उस धरोहररूपी राज्य को उन चरणों में समर्पित करके मैं दुःख से भर गया हूँ - ॥15॥
 
After that, Bharata bowed his head and said to the entire world of nature (ministers, commanders and people etc.) that he was filled with sorrow after dedicating that heritage-like kingdom to those feet - ॥ 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)