श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 115: भरत का नन्दिग्राम में जाकर श्रीराम की चरणपादुकाओं को राज्य पर अभिषिक्त करके उन्हें निवेदन पूर्वक राज्य का सब कार्य करना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  2.115.1 
ततो निक्षिप्य मातॄस्ता अयोध्यायां दृढव्रत:।
भरत: शोकसंतप्तो गुरूनिदमथाब्रवीत्॥ १॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् समस्त माताओं को अयोध्या में रखकर, शोक से व्याकुल होकर दृढ़ निश्चयी भरतने अपने गुरुजनों से इस प्रकार कहा:
 
Thereafter, after keeping all the mothers in Ayodhya, the determined Bharatne, overcome with grief, said to his teachers thus:
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)