श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 114: भरत के द्वारा अयोध्या की दुरवस्था का दर्शन तथा अन्तःपुर में प्रवेश करके भरत का दुःखी होना  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  2.114.24 
नोत्सवा: सम्प्रवर्तन्ते रामशोकार्दिते पुरे।
सा हि नूनं मम भ्रात्रा पुरस्यास्य द्युतिर्गता॥ २४॥
 
 
अनुवाद
'श्री राम के शोक से पीड़ित इस नगर में अब अनेक प्रकार के उत्सव नहीं मनाए जा रहे हैं। निश्चय ही इस नगर का समस्त वैभव मेरे भाई के साथ चला गया है।'
 
'Many types of festivals are no longer being celebrated in this city which is afflicted with the grief of Shri Ram. Certainly, all the splendor of this city has gone away with my brother.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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