| श्रीमद् वाल्मीकि रामायण » काण्ड 2: अयोध्या काण्ड » सर्ग 112: ऋषियों का भरत को श्रीराम की आज्ञा के अनुसार लौट जाने की सलाह देना, भरत का पुनः प्रार्थना करना, श्रीराम का उन्हें चरणपादुका देकर विदा करना » श्लोक 23-25h |
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| | | | श्लोक 2.112.23-25h  | स पादुके सम्प्रणम्य रामं वचनमब्रवीत्।
चतुर्दश हि वर्षाणि जटाचीरधरो ह्यहम्॥ २३॥
फलमूलाशनो वीर भवेयं रघुनन्दन।
तवागमनमाकांक्षन् वसन् वै नगराद् बहि:॥ २४॥
तव पादुकयोर्न्यस्य राज्यतन्त्रं परंतप। | | | | | | अनुवाद | | उन चरणपादुओं को प्रणाम करके भरत ने श्रीराम से कहा- 'वीर रघुनन्दन! मैं भी चौदह वर्षों तक जटा-वस्त्र धारण करके, फल-मूल खाकर, आपके आगमन की प्रतीक्षा में नगर के बाहर रहूँगा। किन्तु इतने दिनों तक मैं आपकी इन चरणपादुओं पर राज्य का सम्पूर्ण भार रखकर आपकी प्रतीक्षा करता रहूँगा।' | | | | After paying obeisance to those sandals, Bharata said to Shri Ram- 'Valiant Raghunandan! I will also stay outside the city for fourteen years, wearing matted hair and clothes, eating fruits and roots, waiting for your arrival. But for so many days, I will keep the entire burden of the kingdom on these sandals of yours and keep waiting for you. | | ✨ ai-generated | | |
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