श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 112: ऋषियों का भरत को श्रीराम की आज्ञा के अनुसार लौट जाने की सलाह देना, भरत का पुनः प्रार्थना करना, श्रीराम का उन्हें चरणपादुका देकर विदा करना  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  2.112.16 
आगता त्वामियं बुद्धि: स्वजा वैनयिकी च या।
भृशमुत्सहसे तात रक्षितुं पृथिवीमपि॥ १६॥
 
 
अनुवाद
‘पिताजी! आपने जो सहज विनय बुद्धि प्राप्त की है, उससे आप सम्पूर्ण जगत् की रक्षा करने में समर्थ हैं।॥16॥
 
‘Father! With the innate humble intelligence that you have acquired, you are capable enough to protect the whole world.॥ 16॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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