श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 112: ऋषियों का भरत को श्रीराम की आज्ञा के अनुसार लौट जाने की सलाह देना, भरत का पुनः प्रार्थना करना, श्रीराम का उन्हें चरणपादुका देकर विदा करना  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  2.112.10 
राम धर्ममिमं प्रेक्ष्य कुलधर्मानुसंततम्।
कर्तुमर्हसि काकुत्स्थ मम मातुश्च याचनाम्॥ १०॥
 
 
अनुवाद
हे ककुत्सवंश के रत्न भगवान राम! कृपया हमारे कुलधर्म से संबंधित राजसिंहासन और प्रजा की रक्षा करने के ज्येष्ठ पुत्र के कर्तव्य पर ध्यान दीजिए और मेरी तथा मेरी माता की प्रार्थना पूर्ण कीजिए॥ 10॥
 
'O Lord Rama, the jewel of the Kakuts' clan! Kindly look at the duty of the eldest son to take the throne and protect the subjects which is related to our family's Dharma, and please fulfill my and my mother's request.॥ 10॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd