श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 112: ऋषियों का भरत को श्रीराम की आज्ञा के अनुसार लौट जाने की सलाह देना, भरत का पुनः प्रार्थना करना, श्रीराम का उन्हें चरणपादुका देकर विदा करना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  2.112.1 
तमप्रतिमतेजोभ्यां भ्रातृभ्यां रोमहर्षणम्।
विस्मिता: संगमं प्रेक्ष्य समुपेता महर्षय:॥ १॥
 
 
अनुवाद
उन अतुलनीय तेजस्वी बंधुओं की रोमांचकारी सभा देखकर वहाँ आये हुए महर्षि आश्चर्यचकित हो गए ॥1॥
 
Seeing the thrilling gathering of those incomparably illustrious brothers, the great sages who had come there were astonished. ॥1॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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