Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
ramayan 2.111.8: जब गुरु वशिष्ठजी ने मधुर शब्दों में ऐसा कहा, तब वहाँ बैठे हुए परम पुरुष श्री राघवेन्द्र ने वशिष्ठजी को इस प्रकार उत्तर दिया ॥8॥   |   ramayan सर्ग 2.111: श्रीराम को पिता की आज्ञा के पालन से विरत होते न देख भरत का धरना देने को तैयार होना तथा श्रीराम का उन्हें समझाकर अयोध्या लौटने की आज्ञा देना   ।   ramayan काण्ड 2: अयोध्या काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 111: श्रीराम को पिता की आज्ञा के पालन से विरत होते न देख भरत का धरना देने को तैयार होना तथा श्रीराम का उन्हें समझाकर अयोध्या लौटने की आज्ञा देना  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  2.111.8 
एवं मधुरमुक्त: स गुरुणा राघव: स्वयम्।
प्रत्युवाच समासीनं वसिष्ठं पुरुषर्षभ:॥ ८॥
 
 
अनुवाद
जब गुरु वशिष्ठजी ने मधुर शब्दों में ऐसा कहा, तब वहाँ बैठे हुए परम पुरुष श्री राघवेन्द्र ने वशिष्ठजी को इस प्रकार उत्तर दिया ॥8॥
 
When Guru Vashishtha said this in melodious words, then the Supreme Being Shri Raghavendra, sitting there, replied to Vashishthaji like this. 8॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)