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ramayan 2.111.7: हे सत्य, धर्म और पराक्रम से युक्त रघुनन्दन! भरत आपसे प्रार्थना कर रहे हैं कि आप अपने स्वरूप में राज्य स्वीकार करें और अयोध्या लौट जाएँ। यदि आप उनकी प्रार्थना स्वीकार भी कर लें, तो भी आप धर्म का उल्लंघन करने वाले नहीं कहलाएँगे।॥ 7॥   |   ramayan सर्ग 2.111: श्रीराम को पिता की आज्ञा के पालन से विरत होते न देख भरत का धरना देने को तैयार होना तथा श्रीराम का उन्हें समझाकर अयोध्या लौटने की आज्ञा देना   ।   ramayan काण्ड 2: अयोध्या काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 111: श्रीराम को पिता की आज्ञा के पालन से विरत होते न देख भरत का धरना देने को तैयार होना तथा श्रीराम का उन्हें समझाकर अयोध्या लौटने की आज्ञा देना  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  2.111.7 
भरतस्य वच: कुर्वन् याचमानस्य राघव।
आत्मानं नातिवर्तेस्त्वं सत्यधर्मपराक्रम॥ ७॥
 
 
अनुवाद
हे सत्य, धर्म और पराक्रम से युक्त रघुनन्दन! भरत आपसे प्रार्थना कर रहे हैं कि आप अपने स्वरूप में राज्य स्वीकार करें और अयोध्या लौट जाएँ। यदि आप उनकी प्रार्थना स्वीकार भी कर लें, तो भी आप धर्म का उल्लंघन करने वाले नहीं कहलाएँगे।॥ 7॥
 
'O son of Raghunandan who is endowed with truth, Dharma and valour! Bharata is requesting you to accept the kingdom in his own form and return to Ayodhya. Even if you accept his request you will not be called a violator of Dharma.'॥ 7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)