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ramayan 2.111.28: 'मेरे पिता ने अपने जीवनकाल में जो कुछ बेचा, सौंपा या खरीदा है, उसे न तो मैं और न ही भरत पलट सकते हैं।॥ 28॥   |   ramayan सर्ग 2.111: श्रीराम को पिता की आज्ञा के पालन से विरत होते न देख भरत का धरना देने को तैयार होना तथा श्रीराम का उन्हें समझाकर अयोध्या लौटने की आज्ञा देना   ।   ramayan काण्ड 2: अयोध्या काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 111: श्रीराम को पिता की आज्ञा के पालन से विरत होते न देख भरत का धरना देने को तैयार होना तथा श्रीराम का उन्हें समझाकर अयोध्या लौटने की आज्ञा देना  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  2.111.28 
विक्रीतमाहितं क्रीतं यत् पित्रा जीवता मम।
न तल्लोपयितुं शक्यं मया वा भरतेन वा॥ २८॥
 
 
अनुवाद
'मेरे पिता ने अपने जीवनकाल में जो कुछ बेचा, सौंपा या खरीदा है, उसे न तो मैं और न ही भरत पलट सकते हैं।॥ 28॥
 
'Whatever my father has sold, entrusted or purchased during his lifetime, neither I nor Bharat can reverse it.॥ 28॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)