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ramayan 2.111.15: यह सुनकर सुमन्तराम श्री रामचन्द्रजी के मुख की ओर ताकने लगे। उन्हें इस अवस्था में देखकर भरतजी को बड़ा दुःख हुआ और वे स्वयं कुशा बिछाकर भूमि पर बैठ गए॥15॥   |   ramayan सर्ग 2.111: श्रीराम को पिता की आज्ञा के पालन से विरत होते न देख भरत का धरना देने को तैयार होना तथा श्रीराम का उन्हें समझाकर अयोध्या लौटने की आज्ञा देना   ।   ramayan काण्ड 2: अयोध्या काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 111: श्रीराम को पिता की आज्ञा के पालन से विरत होते न देख भरत का धरना देने को तैयार होना तथा श्रीराम का उन्हें समझाकर अयोध्या लौटने की आज्ञा देना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  2.111.15 
स तु राममवेक्षन्तं सुमन्त्रं प्रेक्ष्य दुर्मना:।
कुशोत्तरमुपस्थाप्य भूमावेवास्थित: स्वयम्॥ १५॥
 
 
अनुवाद
यह सुनकर सुमन्तराम श्री रामचन्द्रजी के मुख की ओर ताकने लगे। उन्हें इस अवस्था में देखकर भरतजी को बड़ा दुःख हुआ और वे स्वयं कुशा बिछाकर भूमि पर बैठ गए॥15॥
 
On hearing this, Sumantram started staring at Shri Ramchandra's face. Bharata felt very sad to see him in this state and he himself spread a kusha mat and sat on the ground.॥ 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)