श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 110: वसिष्ठजी का ज्येष्ठ के ही राज्याभिषेक का औचित्य सिद्ध करना और श्रीराम से राज्य ग्रहण करने के लिये कहना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  2.110.5 
आकाशप्रभवो ब्रह्मा शाश्वतो नित्य अव्यय:।
तस्मान्मरीचि: संजज्ञे मरीचे: कश्यप: सुत:॥ ५॥
 
 
अनुवाद
'ब्रह्माजी आकाश रूपी परम पुरुष परमात्मा से उत्पन्न हुए हैं, जो अनादि, नित्य और अविनाशी हैं। उनसे मरीचि उत्पन्न हुए और मरीचि के पुत्र कश्यप हुए।
 
'Brahmaji has emerged from the supreme Supreme Soul in the form of sky, who is eternal, eternal and imperishable. Marichi was born from them and Marichi's son was Kashyap.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)