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ramayan 2.108.3: इस संसार में कौन किसका मित्र है और किसको किससे क्या लाभ होता है? जीव अकेला ही जन्म लेता है और अकेला ही नष्ट हो जाता है॥3॥   |   ramayan सर्ग 2.108: जाबालि का नास्तिकों के मत का अवलम्बन करके श्रीराम को समझाना   ।   ramayan काण्ड 2: अयोध्या काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  2.108.3 
क: कस्य पुरुषो बन्धु: किमाप्यं कस्य केनचित्।
एको हि जायते जन्तुरेक एव विनश्यति॥ ३॥
 
 
अनुवाद
इस संसार में कौन किसका मित्र है और किसको किससे क्या लाभ होता है? जीव अकेला ही जन्म लेता है और अकेला ही नष्ट हो जाता है॥3॥
 
‘Who is the friend of whom in this world and who has to gain what from whom? A living being is born alone and perishes alone.॥ 3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)