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ramayan 2.108.18: 'पुण्यवानों की बुद्धि को सामने रखकर, जो सब लोगों को मार्ग दिखाने वाली होने के कारण प्रामाणिक है, भरत के अनुरोध पर आपको अयोध्या का राज-पद स्वीकार करना चाहिए।'॥18॥   |   ramayan सर्ग 2.108: जाबालि का नास्तिकों के मत का अवलम्बन करके श्रीराम को समझाना   ।   ramayan काण्ड 2: अयोध्या काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  2.108.18 
सतां बुद्धिं पुरस्कृत्य सर्वलोकनिदर्शिनीम्।
राज्यं स त्वं निगृह्णीष्व भरतेन प्रसादित:॥ १८॥
 
 
अनुवाद
'पुण्यवानों की बुद्धि को सामने रखकर, जो सब लोगों को मार्ग दिखाने वाली होने के कारण प्रामाणिक है, भरत के अनुरोध पर आपको अयोध्या का राज-पद स्वीकार करना चाहिए।'॥18॥
 
'Putting forward the wisdom of the virtuous, which is authentic as it shows the way to all people, you should accept the kingship of Ayodhya on the request of Bharat.'॥ 18॥
 
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डेऽष्टाधिकशततम: सर्ग:॥ १०८॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एक सौ आठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १०८॥
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)