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ramayan 2.106.8: 'जब मैं परदेश में था, तब मेरी नीच विचार वाली माता ने मेरे कारण पाप किया था। मैं ऐसा नहीं चाहता। अतः आप उसे क्षमा करें और मुझ पर प्रसन्न हों। ॥8॥   |   ramayan सर्ग 2.106: भरत की पुनः श्रीराम से अयोध्या लौटने और राज्य ग्रहण करने की प्रार्थना   ।   ramayan काण्ड 2: अयोध्या काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  2.106.8 
प्रोषिते मयि यत् पापं मात्रा मत्कारणात् कृतम्।
क्षुद्रया तदनिष्टं मे प्रसीदतु भवान् मम॥ ८॥
 
 
अनुवाद
'जब मैं परदेश में था, तब मेरी नीच विचार वाली माता ने मेरे कारण पाप किया था। मैं ऐसा नहीं चाहता। अतः आप उसे क्षमा करें और मुझ पर प्रसन्न हों। ॥8॥
 
'When I was abroad, my mother, who had low thoughts, committed a sin for my sake. I do not want that. So please forgive her and be pleased with me. ॥ 8॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)