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ramayan 2.106.5: हे मनुष्यों के स्वामी! जो आपके समान आत्म-अनात्मा को जानता है, वह दुःख में पड़ने पर भी दुःखी नहीं हो सकता।॥5॥   |   ramayan सर्ग 2.106: भरत की पुनः श्रीराम से अयोध्या लौटने और राज्य ग्रहण करने की प्रार्थना   ।   ramayan काण्ड 2: अयोध्या काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  2.106.5 
परावरज्ञो यश्च स्याद् यथा त्वं मनुजाधिप।
स एव व्यसनं प्राप्य न विषीदितुमर्हति॥ ५॥
 
 
अनुवाद
हे मनुष्यों के स्वामी! जो आपके समान आत्म-अनात्मा को जानता है, वह दुःख में पड़ने पर भी दुःखी नहीं हो सकता।॥5॥
 
'O Lord of men! He who has the knowledge of the Self and the non-Self like you, cannot feel sad even when in trouble. ॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)