श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 106: भरत की पुनः श्रीराम से अयोध्या लौटने और राज्य ग्रहण करने की प्रार्थना  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  2.106.33 
तथाभिरामो भरतेन ताम्यता
प्रसाद्यमान: शिरसा महीपति:।
न चैव चक्रे गमनाय सत्त्ववान्
मतिं पितुस्तद् वचने प्रतिष्ठित:॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
भरत ने ग्लानि में पड़े हुए मनोभिराम राजा श्री रामजी के चरणों में सिर नवाकर उन्हें प्रसन्न करना चाहा, परंतु सत्त्वगुण से युक्त रघुनाथजी ने पिता की आज्ञा में दृढ़ रहकर अयोध्या जाने का विचार भी नहीं किया॥33॥
 
Bharat, lying in guilt, tried to please Manobhiram King Shri Ram by bowing his head at his feet, however Raghunath ji, full of Sattva Guna, did not even think of going to Ayodhya, remaining steadfast in his father's orders. 33॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)