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ramayan 2.106.3: कोई भी दुःख तुम्हें विचलित नहीं कर सकता। कोई भी वस्तु कितनी ही प्रिय क्यों न हो, वह तुम्हें सुखी नहीं कर सकती। यद्यपि तुम वृद्धों का आदर करते हो, फिर भी उनसे संदिग्ध विषयों के विषय में पूछते हो।॥3॥   |   ramayan सर्ग 2.106: भरत की पुनः श्रीराम से अयोध्या लौटने और राज्य ग्रहण करने की प्रार्थना   ।   ramayan काण्ड 2: अयोध्या काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  2.106.3 
न त्वां प्रव्यथयेद् दु:खं प्रीतिर्वा न प्रहर्षयेत्।
सम्मतश्चापि वृद्धानां तांश्च पृच्छसि संशयान्॥ ३॥
 
 
अनुवाद
कोई भी दुःख तुम्हें विचलित नहीं कर सकता। कोई भी वस्तु कितनी ही प्रिय क्यों न हो, वह तुम्हें सुखी नहीं कर सकती। यद्यपि तुम वृद्धों का आदर करते हो, फिर भी उनसे संदिग्ध विषयों के विषय में पूछते हो।॥3॥
 
‘No sorrow can disturb you. No matter how dear a thing is, it cannot make you happy. Even though you respect the elderly, you ask them about doubtful matters.॥ 3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)