श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 106: भरत की पुनः श्रीराम से अयोध्या लौटने और राज्य ग्रहण करने की प्रार्थना  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  2.106.28 
ऋणानि त्रीण्यपाकुर्वन् दुर्हृद: साधु निर्दहन्।
सुहृदस्तर्पयन् कामैस्त्वमेवात्रानुशाधि माम्॥ २८॥
 
 
अनुवाद
वहाँ तुम देवताओं, ऋषियों और पितरों का ऋण चुकाओ, अपने दुष्ट शत्रुओं का भली-भाँति दमन करो, अपने मित्रों को उनकी इच्छानुसार वस्तुओं से संतुष्ट करो और फिर अयोध्या में मुझे धर्म की शिक्षा देते रहो॥ 28॥
 
'There you should repay the debt of the gods, sages and forefathers, suppress your wicked enemies thoroughly, satisfy your friends with things according to their wishes and then you should continue teaching me the Dharma in Ayodhya.॥ 28॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)