श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 106: भरत की पुनः श्रीराम से अयोध्या लौटने और राज्य ग्रहण करने की प्रार्थना  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  2.106.24 
हीनबुद्धिगुणो बालो हीनस्थानेन चाप्यहम्।
भवता च विनाभूतो न वर्तयितुमुत्सहे॥ २४॥
 
 
अनुवाद
'मैं बुद्धि और गुण दोनों से रहित हूँ, बालक हूँ और मेरी स्थिति तुमसे बहुत छोटी है; इसलिए मैं तुम्हारे बिना अपना जीवन भी नहीं चला सकता, राज्य का पालन तो दूर की बात है॥ 24॥
 
'I am devoid of both wisdom and virtue, I am a child and my status is much smaller than yours; therefore I cannot even sustain my life without you, let alone look after the kingdom.॥ 24॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)