श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 105: भरत का श्रीराम को राज्य ग्रहण करने के लिये कहना, श्रीराम का पिता की आज्ञा का पालन करने के लिये ही राज्य ग्रहण न करके वन में रहने का ही दृढ़ निश्चय बताना  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  2.105.45 
आत्मानमनुतिष्ठ त्वं स्वभावेन नरर्षभ।
निशाम्य तु शुभं वृत्तं पितुर्दशरथस्य न:॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
हे मनुष्यों में श्रेष्ठ भरत! हमारे पूज्य पिता दशरथ के शुभ आचरण पर दृष्टि रखते हुए अपने धार्मिक स्वभाव द्वारा आत्मा की उन्नति के लिए प्रयत्न करो।
 
'Bharat, the best among humans! By keeping an eye on the auspicious conduct of our revered father Dasharatha, try for the progress of the soul through your religious nature.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)