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ramayan 2.105.44: 'नरश्रेष्ठ! जो मनुष्य परलोक को जीतना चाहता है, उसे धार्मिक, क्रूरता से रहित और गुरुजनों का आज्ञाकारी होना चाहिए ॥44॥   |   ramayan सर्ग 2.105: भरत का श्रीराम को राज्य ग्रहण करने के लिये कहना, श्रीराम का पिता की आज्ञा का पालन करने के लिये ही राज्य ग्रहण न करके वन में रहने का ही दृढ़ निश्चय बताना   ।   ramayan काण्ड 2: अयोध्या काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 105: भरत का श्रीराम को राज्य ग्रहण करने के लिये कहना, श्रीराम का पिता की आज्ञा का पालन करने के लिये ही राज्य ग्रहण न करके वन में रहने का ही दृढ़ निश्चय बताना  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  2.105.44 
धार्मिकेणानृशंसेन नरेण गुरुवर्तिना।
भवितव्यं नरव्याघ्र परलोकं जिगीषता॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
'नरश्रेष्ठ! जो मनुष्य परलोक को जीतना चाहता है, उसे धार्मिक, क्रूरता से रहित और गुरुजनों का आज्ञाकारी होना चाहिए ॥44॥
 
'Narshrestha! A person who wishes to conquer the next world should be religious, free from cruelty and obedient to his teachers. 44॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)