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ramayan 2.105.43: 'रघुनन्दन! मैं इस वनवास-कार्य को करके अपने पिता के वचनों का पालन करूँगा, जो धर्मात्माओं को भी स्वीकार्य हैं॥ 43॥   |   ramayan सर्ग 2.105: भरत का श्रीराम को राज्य ग्रहण करने के लिये कहना, श्रीराम का पिता की आज्ञा का पालन करने के लिये ही राज्य ग्रहण न करके वन में रहने का ही दृढ़ निश्चय बताना   ।   ramayan काण्ड 2: अयोध्या काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 105: भरत का श्रीराम को राज्य ग्रहण करने के लिये कहना, श्रीराम का पिता की आज्ञा का पालन करने के लिये ही राज्य ग्रहण न करके वन में रहने का ही दृढ़ निश्चय बताना  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  2.105.43 
तद् वच: पितुरेवाहं सम्मतं धर्मचारिणाम्।
कर्मणा पालयिष्यामि वनवासेन राघव॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
'रघुनन्दन! मैं इस वनवास-कार्य को करके अपने पिता के वचनों का पालन करूँगा, जो धर्मात्माओं को भी स्वीकार्य हैं॥ 43॥
 
'Raghunandan! By performing this act of exile, I shall follow the words of my father, which are acceptable even to the righteous.॥ 43॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)