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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
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काण्ड 2: अयोध्या काण्ड
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सर्ग 105: भरत का श्रीराम को राज्य ग्रहण करने के लिये कहना, श्रीराम का पिता की आज्ञा का पालन करने के लिये ही राज्य ग्रहण न करके वन में रहने का ही दृढ़ निश्चय बताना
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श्लोक 39
श्लोक
2.105.39
एते बहुविधा: शोका विलापरुदिते तदा।
वर्जनीया हि धीरेण सर्वावस्थासु धीमता॥ ३९॥
अनुवाद
'धैर्यवान और बुद्धिमान पुरुष को चाहिए कि वह सभी अवस्थाओं में इन नाना प्रकार के शोक, विलाप और रोने का त्याग कर दे।
'A patient and wise man should give up these various types of grief, lamentation and crying in all situations.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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