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ramayan 2.105.38: 'तुम्हारे और मेरे समान ज्ञानी और बुद्धिमान कोई भी विद्वान् मेरे पिता के लिए कभी शोक नहीं कर सकता ॥ 38॥   |   ramayan सर्ग 2.105: भरत का श्रीराम को राज्य ग्रहण करने के लिये कहना, श्रीराम का पिता की आज्ञा का पालन करने के लिये ही राज्य ग्रहण न करके वन में रहने का ही दृढ़ निश्चय बताना   ।   ramayan काण्ड 2: अयोध्या काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 105: भरत का श्रीराम को राज्य ग्रहण करने के लिये कहना, श्रीराम का पिता की आज्ञा का पालन करने के लिये ही राज्य ग्रहण न करके वन में रहने का ही दृढ़ निश्चय बताना  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  2.105.38 
तं तु नैवंविध: कश्चित् प्राज्ञ: शोचितुमर्हसि।
त्वद्विधो मद्विधश्चापि श्रुतवान् बुद्धिमत्तर:॥ ३८॥
 
 
अनुवाद
'तुम्हारे और मेरे समान ज्ञानी और बुद्धिमान कोई भी विद्वान् मेरे पिता के लिए कभी शोक नहीं कर सकता ॥ 38॥
 
'Any scholar who is as knowledgeable and intelligent as you and me can never mourn for my father.॥ 38॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)