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ramayan 2.105.37: ‘हमारे पिता ने अपना पुराना मानव शरीर त्यागकर दैवी सम्पदा प्राप्त कर ली है, जिससे वे ब्रह्मलोक में निवास कर सकेंगे।॥ 37॥   |   ramayan सर्ग 2.105: भरत का श्रीराम को राज्य ग्रहण करने के लिये कहना, श्रीराम का पिता की आज्ञा का पालन करने के लिये ही राज्य ग्रहण न करके वन में रहने का ही दृढ़ निश्चय बताना   ।   ramayan काण्ड 2: अयोध्या काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 105: भरत का श्रीराम को राज्य ग्रहण करने के लिये कहना, श्रीराम का पिता की आज्ञा का पालन करने के लिये ही राज्य ग्रहण न करके वन में रहने का ही दृढ़ निश्चय बताना  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  2.105.37 
स जीर्णमानुषं देहं परित्यज्य पिता हि न:।
दैवीमृद्धिमनुप्राप्तो ब्रह्मलोकविहारिणीम्॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
‘हमारे पिता ने अपना पुराना मानव शरीर त्यागकर दैवी सम्पदा प्राप्त कर ली है, जिससे वे ब्रह्मलोक में निवास कर सकेंगे।॥ 37॥
 
‘Our father, having given up his old human body, has attained the divine wealth which will enable him to live in the Brahmaloka.॥ 37॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)